Sunday, June 5, 2022

खजाने की खोज



एक गांव में एक रामलाल नाम का एक किसान अपनी पत्नी और चार लड़को के साथ रहता था। रामलाल खेतों में मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन उसके चारो लड़के आलसी थे। जो गांव में वैसे ही इधर उधर घूमते रहते थे। एक दिन रामलाल ने अपनी पत्नी से कहा की अभी तो मै खेतों में काम कर रहा हूँ। लेकिन मेरे बाद इन लड़को का क्या होगा। इन्होने तो कभी मेहनत भी नहीं करी। ये तो कभी खेत में भी नहीं गए। रामलाल की पत्नी ने कहा की धीरे धीरे ये भी काम करने लगेंगे। समय बीतता गया और रामलाल के लड़के कोई काम नहीं करते थे। एक बार रामलाल बहुत बीमार पड़ गया। वह काफी दिनों तक बीमार ही रहा।

उसने अपनी पत्नी को कहा की वह चारों लड़को को बुला कर लाये। उसकी पत्नी चारों लड़को को बुलाकर लायी। रामलाल ने कहा लगता है की अब मै ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहूँगा। रामलाल को चिंता थी की उसके जाने के बाद उसके बेटों का क्या होगा। इसलिए उसने कहा बेटों मैने अपने जीवन में जो भी कुछ कमाया है वह खजाना अपने खेतों के निचे दबा रखा है। मेरे बाद तुम उसमे से खजाना निकालकर आपस में बॉंट लेना। यह बात सुनकर चारों लड़के खुश हो गए।

कुछ समय बाद रामलाल की मृत्यु हो गयी। रामलाल की मृत्यु के कुछ दिनों बाद उसके लड़के खेत में दबा खजाना निकालने गए। उन्होंने सुबह से लेकर शाम तक सारा खेत खोद दिया। लेकिन उनको कोई भी खजाना नज़र नहीं आया। लड़के घर आकर अपनी मॉं से बोले मॉं पिताजी ने हमसे झूठ बोला था। उस खेत में हमें कोई खजाना नहीं मिला। उसकी मॉं ने बताया की तुम्हारे पिताजी ने जीवन में यही घर और खेत ही कमाया है। लेकिन अब तुमने खेत खोद ही दिया है तो उसमे बीज बो दो।

इसके बाद लड़को ने बीज बोये और मॉं के कहेनुसार उसमे पानी देते गए। कुछ समय बाद फसल पक कर तैयार हो गयी। जिसको बेचकर लड़कों को अच्छा मुनाफा हुआ। जिसे लेकर वह अपनी मॉं के पास पहुंचे। मॉं ने कहा की तुम्हारी मेहनत ही असली खजाना है यही तुम्हारे पिताजी तुमको समझाना चाहते थे।

सीख

हमें आलस्य को त्यागकर मेहनत करना चाहिए। मेहनत ही इंसान की असली दौलत है।

Saturday, May 28, 2022

चतुर सियार



क बार की बात है एक गांव में एक बैल रहता था। जिसको घूमना बहुत पसंद था। वह घूमता घूमता जंगल में जा पहुंचा और आते समय गांव का रास्ता भूल गया। वह चलता हुआ एक तालाब के पास पहुंचा। जहॉं पर उसने पानी पिया और वहॉं की हरी हरी घास खायी। जिसको खाकर वह बहुत खुश हुआ और ऊपर मुँह करके चिल्लाने लगा। उसी समय जंगल का राजा शेर तालाब की ओर पानी पिने जा रहा था। जब शेर ने बैल की भयानक आवाज़ सुनी तो उसने सोचा जरूर जंगल में कोई खतरनाक जानवर आ गया है। इसलिए शेर बिना पानी पिए ही अपनी गुफा की तरफ भागने लगा। शेर को इस तरह डर कर भागते हुए 2 सियार ने देख लिया। वह शेर के मंत्री बनना चाहते थे। उनने सोचा यही सही समय है शेर का भरोसा जितने का। दोनों सियार शेर की गुफा में गए और बोले हमने आपको डर कर गुफा की ओर आते हुए देखा था। आप जिस आवाज़ से डर रहे थे वह एक बैल की थी।

यदि आप चाहे तो हम उसको लेकर आपके पास आ सकते है। शेर की आज्ञा से दोनों बैल को अपने साथ लेकर आ गए और शेर से मिलाया। कुछ समय बाद शेर और बैल बहुत ही अच्छे मित्र बन गए। शेर ने बैल को अपना सलाहकार रख लिया। यह बात जानकर दोनों सियार उनकी दोस्ती से जलने लगे क्योकि उनने जो मंत्री बनने का सोचा था वह भी नहीं हुआ। दोनों सियार ने तरकीब निकाली और शेर के पास गए। वह शेर से बोले बैल आपसे केवल मित्रता का दिखावा करता है। लेकिन हमने उसके मुँह से सुना है वह आपको अपने दोनों बड़े सींगो से मारकर जंगल का राजा बनना चाहता है। पहले तो शेर ने विश्वास नहीं किया लेकिन उसको ऐसा लगने लगा।

दोनों सियार इसके बाद बैल के पास गए। वह बैल से बोले शेर तुमसे केवल मित्रता का दिखावा करता है। मौका मिलने पर वह तुमको मार कर खा जायेगा। बैल को यह जानकर बहुत गुस्सा आया और वह शेर से मिलने के लिए जाने लगा। सियार पहले ही शेर के पास जाकर बोले की बैल आपको मारने के लिए आ रहा है। बैल को गुस्से में आता देख शेर ने सियार की बात सच समझी और बैल पर हमला कर दिया। बैल ने भी शेर पर हमला किया और दोनों आपस में लड़ने लगे। अंत में शेर ने बैल को मार दिया और दोनों सियारों को अपना मंत्री बना लिया।

सीख 

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की हमें कभी भी दूसरों के कहने पर अपनी मित्रता पर शक नहीं करना चाहिए। अच्छे मित्र बड़ी मुश्किल से मिलते है।

Tuesday, May 24, 2022

श्रीराम का न्याय



क दिन एक कुत्ता श्रीराम (Shriram) के दरबार में आया और उसने प्रभु से शिकायत की , ‘राजन, कितने दु:ख की बात है कि जिस राज्य की कीर्ति चहुंओर फैली है वहीं लोग हिंसा और अन्याय का सहारा लेते हैं। मैं आपके महल के पास ही एक गली में लेटा हुआ था। एक साधु आया और उसने मुझे पत्थर मारकर घायल कर दिया। देखिए मेरे सिर पर पत्थर से बने घाव से अभी भी रक्त बह रहा है। वह साधु अभी भी गली में ही होगा। कृपया मेरे साथ न्याय कीजिए और अन्यायी को उसके दुष्कर्म का दंड दीजिए।’

श्रीराम के आदेश पर साधु को दरबार में लिवा लाया गया। साधू ने अपना बचाव करते हुए कहा, ‘यह कुत्ता गली में पूरा मार्ग रोककर लेटा हुआ था। मैंने इसे उठाने के लिए आवाजें दीं और ताली बजाई लेकिन यह नहीं उठा। मुझे गली के पार जाना था इसलिए मैंने इसे एक पत्थर मारकर भगा दिया।’

श्रीराम ने साधु से कहा, ‘एक साधु होने के नाते तो तुम्हें किंचित भी हिंसा नहीं करनी चाहिए थी। तुमने गंभीर अपराध किया है और इसके लिए दंड के भागी हो।‘ श्रीराम ने साधु को उसके अपराध की सजा देने के विषय पर दरबारियों से चर्चा की। दरबारियों ने एकमत होकर निर्णय लिया कि इस बुद्धिमान कुत्ते ने यह वाद प्रस्तुत किया है तो सजा के विषय पर भी इसका मत ले लिया जाए।

कुत्ते ने कहा, ‘राजन, इस नगरी से पचास योजन दूर एक अत्यंत समृद्ध और संपन्न मठ है जिसके महंत की दो वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है। कृपया इस साधु को उस मठ का महंत नियुक्त कर दें।’

श्रीराम और सभी दरबारियों को ऐसा विचित्र दंड सुनकर बड़ी हैरानी हुई। उन्होंने कुत्ते से ऐसा दंड सुनाने का कारण पूछा। कुत्ते ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘मैं ही दो वर्ष पूर्व उस मठ का महंत था। ऐसा कोई सुख, प्रमाद, या दुर्गुण नहीं है जो मैंने वहां रहते हुए नहीं भोगा हो। इसी कारण इस जन्म में मैं कुत्ता बनकर पैदा हुआ हूं। अब शायद आप मेरे दंड का भेद जान गए होंगे।’

बंदर की क्रान्ति



प्रकृति विज्ञानियों ने जापान (Japan) के मैकॉक बंदरों (macaque monkey) का उनके प्राकृतिक परिवेश में कई तक अध्ययन किया। जापान के कोशिमा द्वीप (Koshima Island) पर प्रकृति विज्ञानियों ने बंदरों को खाने के लिए शकरकंद (Sweet potato) दिए जो रेत में गिर जाते थे। बंदरों को शकरकंद का स्वाद भा गया लेकिन रेत के कारण उनके मुंह में किरकिरी हो जाती थी।

‘माह की इमो’ नामक एक मादा बंदर ने इस समस्या का हल शकरकंद को समीप बहती स्वच्छ जलधारा में धोकर निकाल लिया। उसने यह तरकीब अपनी मां को भी सिखा दी। देखते-ही-देखते बहुत सारे बच्चे बंदर और उनकी मांएं पानी में धोकर शकरकंद खाने लगे। सभी वयस्क बंदर 10 से 12 माह में शकरकंद को पानी में धोकर खाने लायक बनाना सीख गए। तभी एक अनूठी घटना हुई। कोशिमा द्वीप के बहुत सारे बंदर वसंत महीने में शकरकंद को धोकर खा रहे थे। उनकी निश्‍चित संख्या का पता नहीं है। मान लें कि एक सुबह वहां 10 बंदर थे जिन्हें पानी में शकरकंद धोकर खाना आ गया था। अब यह भी मान लें कि अगली सुबह 11 वें बंदर ने भी पानी में धोकर शकरकंद खाना सीख लिया। इसके बाद तो चमत्कार हो गया। उस शाम तक द्वीप के सभी बंदर पानी में धोकर फल खाने लगे। उस 11 वें बंदर द्वारा उठाए गए कदम ने एक वैचारिक क्रांति को जन्म दे दिया था। यह चमत्कार यहीं पर नहीं रुका। समुद्र को लांघकर दूसरे द्वीपों तक जा पहुंचा। ताकासकियामा द्वीप के सारे बंदर अपने फल पानी में धोकर खाते देखे गए। अन्य द्वीपों के बंदर भी अपने फल धोकर खाने लगे।

इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि जब एक समूह के सदस्यों में निश्‍चित संख्या में जागरूकता आ जाती है तो वह जागरूकता चेतना के रहस्यमयी मानसिक स्तर पर फैल जाती है।

Sunday, May 8, 2022

तीन बकरे


सालों पहले चंदेरी जंगल में तीन बकरे रहते थे। तीनों भाई थे, जो हमेशा मिलजुलकर घास खाते थे। एक बड़े से मैदान में वो रोज जाते और भरपेट खाकर खुशी-खुशी साथ रहते थे। धीरे-धीरे उस जगह की घास खत्म होने लगी, तो उनमें से सबसे बड़े बकरे ने कहा कि अब हमें यह जगह छोड़नी होगी। यहां खाने के लिए अब कुछ भी नहीं बचा है। तब सबसे छोटे बकरे ने कहा कि नदी के दूसरी ओर ऐसी जगह है, जहां चारों ओर घास ही घास है। अगर हम वहां चले जाएं, तो आराम से पूरी जिंदगी गुजार सकते हैं।

तभी बीच वाला बकरा बोला कि बात तो सही है, लेकिन हम नदी पार नहीं कर पाएंगे। नदी के बीच में बने पुल के नीचे एक राक्षस रहता है। वो वहां से गुजरने वाले हर किसी को खा जाता है। तब सबसे बड़े बकरे ने कहा कि मेरे पास एक तरकीब है, जिससे हम उस राक्षस को मार सकते हैं। उसने अपने दोनों भाई के कान में कुछ कहा और सभी खुशी-खुशी नदी की ओर जाने लगे।

पुल के पास पहुंचते ही सभी बकरे एक पेड़ के पीछे छुप गए। तभी बड़े बकरे ने सबसे छोटे बकरे को इशारा करके पुल पार करने को कहा। जैसे ही वह छोटा बकरा पुल पार करने लगा, तो वहां राक्षस आ गया। राक्षस बोला, तुम्हारी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई? अब मैं तुमको खा जाऊंगा।

तभी बकरा कहता है कि राक्षस महाराज, मैं तो बहुत छोटा हूं। मुझे खाने से आपका पेट भी नहीं भर पाएगा। आप एक काम कीजिए, पीछे मेरा बड़ा भाई आ रहा है। वो बहुत मोटा है आप उसको खाकर अपनी भूख मिटा लो। राक्षस को छोटे बकरे के मुंह से महाराज शब्द सुनकर अच्छा लगा। खुश होते हुए राक्षस ने कहा, ठीक है तुम बहुत छोटे हो, मैं तुम्हारे बड़े भाई को खा लूंगा।

छोटा बकरा वहां से चला गया। इसके बाद बड़े बकरे ने दूसरे बकरे को इशारा किया। फिर वो भी पेड़ के पीछे से निकल कर पुल पार करने लगा। वहां राक्षस पहले से ही उसका इंतजार कर रहा था। बकरे को देखकर राक्षस खुश हुआ और उससे कहा कि मैं तुमको खा जाऊंगा। तभी बकरे ने घबराकर कहा, हे राजाधिराज, मुझे खाकर आपको क्या मिलेगा? मैं तो आपके नाश्ते के बाराबर भी नहीं हूं। आप थोड़ा और इंतजार करें, तो आपको ऐसी दावत मिलेगी कि आप कभी नहीं भूलेंगे।

राक्षस ने उसकी बात सुनकर पूछा, कैसे? तब बकरे ने कहा कि पीछे से मेरा बड़ा भाई आ रहा है। वो मेरे जैसे दस बकरों के बराबर है। आप उसे कई दिनों तक आराम से खा सकते हैं। राक्षस ने उसके मुंह से राजाधिराज और मोटा बकरा खाने की बात सुनकर उसे पुल पार करने की इजाजत दे दी।

आखिर में सबसे बड़ा बकरा पुल के ऊपर चढ़ा और उसे पार करने लगा। तभी उसके सामने राक्षस आ गया और जोर-जोर से हंसने लगा। हंसने के बाद राक्षस ने कहा कि आज तो मजा ही आ गया। तुम बहुत मोटे हो, तुम्हें खाकर मैं अपनी भूख मिटाऊंगा।

राक्षस की बात सुनकर बकरा कुछ कदम पीछे गया और तेजी से दौड़ता हुआ राक्षस के सीने पर अपने सींग मार दिए। अचानक हुए वार से राक्षस संभल नहीं पाया और पानी में गिर गया। गिरते ही वह नदी के तेज बहाव में बहता हुआ दूर निकल गया। इसके बाद तीनों बकरे आराम से अपनी जिंदगी नई जगह में घास खाते हुए गुजारने लगे।

Saturday, May 7, 2022

नींद


हुत सारे लोगों की हालत ऐसी है कि अगर उन्होंने अपने आप को बहुत कुछ करके तैयार न किया हो तो वे, एक घंटे के लिए ध्यान में बैठने पर मुश्किल से तीन मिनट ही ध्यान की अवस्था में रह पाते हैं। बार- बार, बार-बार, वे एक क्षण उसमें होते हैं और फिर कहीं और पहुंच जाते हैं। अपनी नींद में ध्यान कैसे किया जाए, यह सोचने की बजाय, आप का ध्यान करने का समय चाहे जितना भी हो, उसकी गुणवत्ता को बढ़ाना बेहतर है। कम से कम अपनी नींद को तो अपने सोचने से मत बिगाड़िए। बस, अच्छी तरह से सोइए, जैसे कि कहते हैं, ‘लकड़ी के कुंदे (टुकड़े) की तरह सोइए’। अगर आप इस तरह नहीं सो सकते तो एक बिल्ली या कुत्ते की तरह सोइए। आध्यात्मिकता को अपनी नींद में लाने की कोशिश मत कीजिए। बस ऐसे सोइए, जैसे कि आप मर गए हों। मरे हुए लोगों के शरीर कड़े हो जाते हैं पर वे सब कुछ भरपूर होने की गहरी अवस्था में होते हैं। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं होती कि वे कैसे दिख रहे हैं?

तो, इसी तरह से, जब आप सो रहे हों तो आप को इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि आप के साथ क्या हो रहा है? मैंने अमेरिका में एक बात देखी कि सुबह जब आप लोगों से मिलते हैं, तो बहुत से लोग पूछते हैं, ‘क्या आप अच्छी तरह से सोये थे’? मुझे यह प्रश्न समझ नहीं आता था क्योंकि यह कोई मुद्दा ही नहीं था। पर अब मैं देखता हूं कि बहुत से लोगों के लिए नींद एक मुद्दा होती है। अगर आप अपनी नींद में ध्यान करने की कोशिश करेंगे तो नींद जरूर ही आपके लिए एक मुद्दा हो जाएगी। तो अपनी नींद को पूरी तरह से, भरपूर होने दीजिए।

अगर आप एक मरे हुए आदमी की तरह सोना नहीं चाहते तो एक छोटे से शिशु की तरह सोइए। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकान ने इस बारे में एक सुंदर बात कही। ओबामा के खिलाफ चुनाव हारने के बाद जब लोगों ने उनसे पूछा, ‘आप कैसे हैं’? तो वे बोले, ‘मैं एक छोटे से शिशु की तरह सो रहा हूं। हर दो घंटे में उठता हूं, रोता हूं और फिर सो जाता हूं’। यह उस आदमी के लिए बहुत ही अद्भुत बात थी। अगर हारने पर भी आप हंसी-मजाक कर सकते हैं, तो एक छोटे शिशु की तरह सो सकते हैं।

ज्ञान से हुई मोक्ष की प्राप्ति


एक दिन गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कुटिया में बैठे थे। सभी शिष्य आज जानना चाहते थे कि मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने बुद्ध जी से निवेदन किया कि वो आज मोक्ष पर उपदेश दें। शिष्यों की बात मान कर बुद्ध जी ने एक कहानी सुनाना शुरू किया। यह कहानी थी एक जल्लाद और भिक्षुक की।

अपने राज्य का मुख्य जल्लाद, जिसने बहुत से गुनाहगारों को दंड दिया था। अब वह रिटायर हो कर राज्य से बाहर एक कुटिया बना कर अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। उसे हमेशा लगता था कि उसने कितने लोगों की हत्या की है, वह कितना पापी है, ऐसे ख्यालों से वह हमेशा घिरा रहता था। वह अपना सारा दिन पश्चाताप में ही गुजारता था।

एक दिन वह रोज की तरह इन्हीं खयालों में खोया हुआ, खाना खाने के लिए थाली परोस रहा था। तभी उसको दरवाजे से किसी की आवाज आई। उसने बाहर जा कर देखा तो एक भिक्षुक खड़ा था। भिक्षुक के चेहरे को देख कर ही जल्लाद समझ गया कि भिक्षुक बहुत ही लम्बी साधना के बाद आज उठा है और भूख से व्यकुल भी है।

 जल्लाद के मन में आया की जिंदगी भर तो मैंने बस हत्याएं ही की हैं, आज मौका मिला है कुछ पुण्य कमाने का तो इसे गंवाना नहीं चाहिए। उसने भिक्षुक को अन्दर बुलाया और अपनी खाने की थाली उसे दे दी। भिक्षुक खाना देख कर बहुत प्रसन्न हुए। भर पेट भोजन कर के भिक्षुक ने जल्लाद से बातचीत शुरू की।

जल्लाद ने भिक्षुक को अपने जीवन की सारी कहानी सुनाई। उसने बताया कि वह कैसा काम करता था, उसने कितने लोगों को फांसी दी और वह सोचता है कि वह कितना बड़ा अपराधी है। जल्लाद की वेदना सुन कर भिक्षुक बहुत ही शांत स्वर में बोले कि क्या तुमने वो जीव हत्याएं अपनी मर्जी से की थी?

जल्लाद ने कहा, नहीं मैं तो बस मेरे राजा की आज्ञा का पालन कर रहा था। मेरा कोई भाव नही था उन्हें मृत्युदंड या सजा देने का। तब भिक्षुक ने कहा, तब तुम अपराधी कैसे हुए। तुम तो अपने राजा के आदेशों का पालन कर रहे थे।

जल्लाद को एहसास हुआ कि वह किसी गलत काम के लिए जिम्मेदार नहीं था उसका कोई दोष नहीं है, वह तो सिर्फ अपना दायित्व पूरा कर रहा था। इस प्रकार जल्लाद का मन शांत हुआ फिर भिक्षुक ने जल्लाद को उपदेश दिया और उस से विदा ले ली। भिक्षुक को विदा कर के जब जल्लाद वापस घर में आया, उसकी मृत्यु हो गयी। जिसके बाद उसको मोक्ष प्राप्त हुआ।

इतना कह कर बुद्ध जी ने कहानी को विराम दिया। सभी शिष्य बहुत ही आश्चर्य के साथ बुद्ध जी की ओर देख रहे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि जिसने इतनी हत्याएं की हो उसे मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है। तब एक शिष्य ने यह दुविधा बुद्ध जी के सामने रखी। बुद्ध जी ने तब शिष्यों को समझाया की भिक्षुक के उपदेश से जल्लाद को ज्ञान प्राप्त हो गया था। जल्लाद के जीवन में पहली बार किसी ने उसे ज्ञान का उपदेश दिया था। इसलिए मृत्यु के बाद उसे मोक्ष प्राप्त हुआ।

अपनी बात को विराम देते हुए अंत में बुद्ध जी बोले, बिना ज्ञान के हजार शब्दों का उपदेश भी बेकार है, किन्तु जब शांत मन से उपदेश का एक शब्द भी सुन लिया जाए तो वह ज्ञान दे देता है। और ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।

कहानी से सीख

इस कहानी ने हमे सिखाया की अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी दुर्भाव के पूरी निष्ठा के साथ करना चाहिए। साथ ही अपना मन हमेशा शांत रखना चाहिए। क्योंकि शांत मन से उपदेश सुनने पर ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। जो मोक्ष की ओर ले जाता है।

बुद्धिमान राजा


सालों पहले एक नगर में एक बुद्धिमान राजा राज्य करता था। उनकी बुद्धि और होशियारी की चर्चा दूर-दूर तक थी। राजा कभी भी बिना सोचे-समझे कुछ नहीं कहता और न ही किसी आरोपी की बात सुने बिना उसे सजा सुनाता था। उसकी बुद्धिमत्ता के चर्चे सुनकर आसपास के राजा, रानियां और राजकुमारी आदि उनसे जलते थे।

इसी जलन के चलते सभी उस राजा की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेने के लिए नए-नए तरीके अपनाते थे। हर बार राजा दूसरे राज्य के शासकों द्वारा ली गई परीक्षा में खरा उतर कर खुद को होशियार और योग्य राजा साबित करता था।

एक दिन राजा की परीक्षा लेने के लिए एक राजकुमारी आई। उसके हाथों में दो फूलों की माला थी। दोनों माला में से एक असली फूल से बनी थी और दूसरी नकली से। उन दोनों मालाओं को देखकर उनका ये भेद बिल्कुल पता नहीं चल पाता था। इसी वजह से राजकुमारी ने राजा के सामने दोनों मालाएं रखकर पूछा, ‘हे राजन! अगर आप बुद्धिमान हैं, तो बताइए कि इनमें से कौन-सी माला असली है।

राजदरबार में बैठे सभी दरबारी माला को देखकर हैरान थे, क्योंकि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि असली फूलों की माला कौन-सी है। सभी इस सोच में थे कि राजा कैसे बता पाएंगे कि असली फूलों की माला कौन-सी है।

राजा भी माला को देखकर परेशान होने लगे। उसी वक्त उनके दिमाग में कुछ तरकीब आई। उन्होंने तुरंत अपने एक सेवक से कहा, ‘बगीचे की खिड़कियों को खोल दो।’ सेवक ने बगीचे की खिड़की को जैसे ही खोला, तो राजा ने देखा कि फूल में बैठी मधुमक्खियां खिड़कियों से राज दरबार में आ रही हैं। वो कुछ देर मधुमक्खियों को ही देखते रहे। जैसे ही एकात मधुमक्खी एक फूल की माला में बैठी, वैसे ही राजा ने कहा कि अब मैं बता सकता हूं कि असली माला कौन-सी है।

राजा ने तुरंत उस माला की तरफ इशारा किया, जिसपर मधुमक्खी बैठ रखी थी। राजा की होशियारी देखकर दरबार में मौजूद सभी उनकी तारीफ करने लगे। सभी कहने लगे कि हर राज्य को आपके जैसे ही बुद्धमान राजा की जरूरत है। 

राजकुमारी भी राजा के बुद्धिमत्ता देखकर खुश हो गई। उसने भी बुद्धिमान राजा की तारीफ में कुछ शब्द कहे और वहां से अपने राज्य की ओर निकल पड़ी।

Thursday, February 3, 2022

सृष्टि का नियम

एक तपस्वी ने वृक्ष की छाया में आराम किया और प्रस्थान के समय वृक्ष से वर मांगने का आग्रह किया। वृक्ष ने इच्छा व्यक्त की कि उसके वर्तमान पत्ते कभी उससे अलग न हों। ‘तथास्तु’ कहकर तपस्वी ने उससे विदा ली। बहुत समय बाद संयोगवश तपस्वी पुनः वहां से गुजर रहा था। उदास-निराश वृक्ष ने गुहार लगायी, ‘महात्मन! पूर्वकाल में दिया गया वर वापस ले लीजिए। उस समय मोहवश मैं यह भूल गया था कि परिवर्तन सृष्टि का सतत नियम है। इस नियम की अनदेखी करने के कारण मैं श्रीवृद्धि के लिए तरस रहा हूं। मैं जान गया हूं कि पुराना खोकर ही नया पाया जा सकता है।’

Thursday, January 16, 2020

जीवन का रहस्य


महर्षि याज्ञवल्क्य के पास राजा जनक बैठे हुए थे। दोनों में धर्मचर्चा चल रही थी। राजा जनक ने महर्षि से पूछा कि ’ऋषिराज मेरे मन मैं एक शंका है कृपया उसका निवारण करे। हम जो देखते हैं, वह किसकी ज्योति से देखते हैं?’
महर्षि ने जवाब दिया कि ’यह क्या बच्चों जैसी बात करते हैं आप? सभी जानते हैं कि हम जो कुछ भी देखते हैं वह सूर्य की ज्योति की वजह से देखते हैं्।’ 
राजा जनक ने पुन: प्रश्न किया कि ’जब सूर्य अस्त हो जाता है तब हम किसके प्रकाश से देखते हैं?’ महर्षि ने उत्तर दिया की ’उस समय हम चंद्रमा के प्रकाश से देखते हैं्।’
जनक ने अगला प्रश्न किया कि ’ जब सूर्य न हो, चंद्र न हो, तारों से भरी रात न हो, अमावस्या का अंधकार हो, तब हम किसके प्रकाश से देखते हैं?’
महर्षि ने जवाब दिया, ’तब हम शब्दों की ज्योति से देखते हैं्। कल्पना करें - विस्तृत वन है, घना अंधेरा है, एक पथिक रास्ता भूल गया है, वह आवाज देता है, मुझे रास्ता दिखाओ्। तभी दूर खड़ा एक व्यक्ति कहता है कि इधर आओ, मैं तुमको रास्ता दिखाता हूं्। इस तरह से पहला शब्द प्रकाश व्यक्ति तक पहुंच जाता है?
जनक ने फिर से प्रश्न किया कि महर्षि! ’जब शब्द भी नहीं हो तब हम किस ज्योति से देखते हैं?’ महर्षि ने जवाब दिया, ’उस समय हम आत्मा की ज्योति से देखते हैं और उसी ज्योति से सारे काम करते हैं्।’
राजा जनक ने प्रश्न किया ’महर्षि यह आत्मा क्या है?’ महर्षि ने उत्तर दिया, योयं विज्ञानमये : प्राणेशु ह्नद्यज्योर्ति: पुरूष: । अर्थात जो विशेष ज्ञान से भरपूर है, जीवन और ज्योति से भरपूर है, जो ह्रदय में विद्यमान है, अंत:करण की ज्योति में और सारे शरीर में विद्यमान है, वही आत्मा है। जब कहीं कुछ दिखाई नहीं देता है तब आत्मा की ज्योति ही जीवन-जगत को प्रकाशित करती है। 

समस्या का समाधान


एक बार एक महिला महाराष्ट्र के महान संत ज्ञानेश्वर महाराज से मिलने उनके आश्रम में गई। संध्या का समय था और संत ज्ञानेश्वर भोजन कर रहे थे। उस समय महिला ने बाहर बैठकर प्रतिक्षा करना उचित समझा। महिला के साथ उसका पुत्र भी था। महिला ने अपने पुत्र से कहा कि ’महाराज अभी भोजन कर रहे हैं इसलिए हमको अभी प्रतिक्षा करना पड़ेगी। इसके बाद ही वह हमारी समस्या का समाधान करेंगे।’
कुछ देर पश्चात एक महिला कुटिया से बाहर आई और कहा कि ’आप दोनों को महाराज ने अंदर बुलाया है।’ महिला अपने पुत्र को लेकर अंदर गई और उसने संत से कहा कि ’महाराज इसको अपच की समस्या है। मैने इसको कई दवाइयां दी, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।’ ज्ञानेश्वर महाराज ने महिला से कहा कि ’बहन इसको कल लेकर आना।’
दूसरे दिन जब महिला अपने पुत्र को लेकर महाराज के पास गई तो संत ज्ञानेश्वर ने बच्चे से पूछा कि ’तू गुड़ ज्यादा खाता है क्या?’ बच्चे ने इसका जवाब हां में दिया, तब संत ज्ञानेश्वर ने बच्चे से कहा कि ’तू गुड़ खाना बंद कर दे जल्दी ठीक हो जाएगा।’ बच्चे ने भी ज्ञानेश्वर महाराज की बात मान ली। महिला अब यह सोंचने लगी कि यह बात महाराज ने कल क्यों नहीं बता दी। इतनी छोटी सी बात के लिए बेमतलब दो बार चक्कर दिया। महिला से रहा नहीं गया और उसने ज्ञानेश्वर महाराज से पूछ लिया। कि ’यह बात तो आप कल भी बता सकते थे?’ 
संत ज्ञानेश्वर ने कहा कि ’बहन जब आप कल बच्चे को लेकर आई थी तब मेरे सामने गुड़ ही रखा था। ऐसे में मैं उसको गुड़ खाने के लिए मना कैसे कर सकता था? वह यही सोंचता की खुद तो गुड़ खाते हैं, लेकिन मुझे खाने के लिये मना कर रहे हैं, लेकिन आज मैं इस स्थिति में हूं कि उसको गुड़ खाने के लिए मना कर सकता हूं।’ इतना सुनते ही उस स्त्री ने संत ज्ञानेश्वर के पैर छूए और उनका आभार व्यक्त कर चली गई।

Wednesday, November 6, 2019

शास्त्रीजी की मानवता



बात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री रेलमंत्री थे। मंत्री होने के बावजूद शास्त्रीजी सामान्य व्यक्तियों की भांति सहज व सरल स्वभाव के थे। अहंकार उन्हें रत्तीभर भी छू नहीं पाया था। दूसरों का दु:ख-दर्द देखकर वे तत्काल हरसंभव सहायता करने हेतु तत्पर रहते थे। एक बार उन्हें किसी सभा को संबोधित करने के लिए एक शहर में जाना था। सामान्यत: वे रेल से ही सफर करते थे और कार का उपयोग नहीं करते थे। उस दिन उन्हें किसी कारणवश काफी विलंब
हो गया था और साथ चल रहे एक अन्य मंत्री ने भी काफी आग्रह किया तो वे कार से सफर करने को तैयार हो गए। जब वे दोनों कार में बैठकर जा रहे थे तो रास्ते में अचानक एक स्थान पर कुछ लोगों ने कार को रोक लिया और उनमें से एक ने कहा, साहब, एक किसान की पत्नी को बच्चा होने वाला है। समय पर उसे अस्पताल नहीं पहुंचाया गया तो उसकी और बच्चे की जान को खतरा हो सकता है। आप अपनी कार से उसे शहर छोड़ दीजिए।

शास्त्रीजी तुरंत कार से उतरे और बोले, उस महिला को ले आओ, मैं कार से उसे शहर के अस्पताल पहुंचा दूंगा। यह सुनकर सहयोगी मंत्री ने कहा, आप यह क्या कर रहे हैं? हमें वैसे ही काफी विलंब हो चुका है।

शास्त्रीजी शांति से बोले, ‘मान्यवर! यदि मैं सभा में नहीं जाऊंगा तो अनर्थ नहीं होगा। यदि मैंने उस महिला को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया तो दो जीवन संकट में पड़ जाएंगे। जीवन बेशकीमती है।’ चाहे कैसे भी हालात हों, हर कीमत पर उसे बचाने की कोशिश करना ही सच्चा मानव धर्म है।

Tuesday, November 5, 2019

ब्रह्म का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है ओम


श्रीरामकृष्ण का कथन है कि वेदों का विलय गायत्री में और गायत्री का विलय प्रणव (ओम्) में होता है और प्रणव का समाधि या अतिचेतनावस्था में अपने आप विलय हो जाता है। 
गायत्री एवं ओम् के अंतर्संबंध पर रामकृष्ण संघ के संन्यासी स्वामी घनानंद के एक आलेख का अंश

पुरातन काल में हिन्दू सूर्य के प्रकाश में, मानव के नेत्रों की ज्योति में तथा चेतना के केन्द्र माने जाने वाले हृदय में, अभिव्यक्त ब्रह्म की उपासना किया करते थे। गायत्री उपासना सूर्य के प्रकाश में अभिव्यक्त ब्रह्म की उपासना है। उन्होंने सूर्य को प्रकाश और जीवन के चरम उत्स के रूप में स्वीकार किया, क्योंकि सूर्य के बिना पृथ्वी पर समस्त जीवन का लोप हो जाएगा और सारा संसार अंधकार में डूब जाएगा।

गायत्री मंत्र की दीक्षा प्राप्त हिन्दू युवक को सूर्योदय, सूर्यास्त और मध्याह्न के समय सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश पर मन को एकाग्र करने को कहा जाता है। उसके बाद उसे कहा जाता है कि वह सूर्य में प्रकाश के स्रोत अथवा जीवन का चिंतन करे। इससे वह स्वयं के भीतर विद्यमान प्राण अथवा प्रज्ञालोक के स्रोत तक पहुंचता है, जिसके बिना वह सूर्य के आलोक या उस प्रकाश की प्राण सत्ता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।

अंतिम अवस्था में उसे अपने भीतर के प्रकाश (के जीवन) और सूर्य में विद्यमान प्रकाश (के जीवन) के एकत्व पर ध्यान करने को कहा जाता है। अर्थात् स्वयं में विद्यमान एकमात्र सत्ता व समग्र ब्रह्मांड की एकमात्र सत्ता के एकत्व पर ध्यान करने को कहा जाता है। अंतत: वह इसका साक्षात्कार करता है।  ज्यों ही वह अपनी आत्मा का साक्षात्कार करता है, त्योंही ब्रह्म या परमात्मा के साथ उसके एकत्व की अनुभूति अपने आप हो जाती है। गायत्री मंत्र एक अत्यंत उदात्त वैदिक प्रार्थना है। इसका अर्थ है-हम तीनों लोगों के स्रष्टा परमात्मा के ज्योतिर्मय स्वरूप का ध्यान करें। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में लगाएं। गायत्री मंत्र की आवृत्ति के पहले ’भू: भुव: स्व:’ इन तीन व्याहृतियों का सदा उच्चारण किया जाना चाहिए  और इनके पूर्व ओम् का उच्चारण होना चाहिए। भू: का अर्थ है पृथ्वी। भुव: का अर्थ है अंतरिक्ष लोक और स्व: का अर्थ है स्वर्गलोक। इनकी रचना ईश्‍वर कहलाने वाली दैवी शक्ति अथवा सगुण ब्रह्म ने की है। इन ईश्‍वर निर्मित तीन लोकों के चिंतन से जगत स्रष्टा ईश्‍वर का स्मरण हो जाता है।

कहते हैं कि गायत्री का लय प्रणव (ओम) में होता है। ओम् शब्द क्या है? ओम्- अ, उ और म, इन तीन अक्षरों से मिलकर बना है और प्रत्येक चेतना की एक अवस्था-विशेष का प्रतीक है। लेकिन अकेला एकाक्षर ओम् चतुर्थ या तुरीय या ब्रह्म का प्रतीक है। अत: पूर्ण ओम् ब्रह्म का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। जाग्रत अवस्था का मानव, स्वप्नावस्था का मानव तथा सुषुप्तावस्था का मानव, ये तीनों एक ही आत्मा की तीन अभिव्यक्तियां हैं। इस प्रकार आंतरिक स्तर पर चेतना की तीनों अवस्थाओं के बीच एक एकत्व का बोध विद्यमान रहता है। यह एकत्व-बोध आत्मा नहीं है, लेकिन वह उसकी मानव द्वारा तुरीय नामक विशुद्ध चैतन्य के रूप में अनुभूति की संभावना का संकेत प्रदान करता है। वस्तुत: तुरीय कोई अवस्था नहीं है, क्योंकि वह अनंत है, लेकिन उसे बोलचाल में चतुर्थ या अतींद्रिय अवस्था कहा जाता है। यही बाह्य जगत के पीछे विद्यमान चैतन्य सत्ता है। यही ब्रह्म है, जो उपनिषदों की एकमात्र विषय वस्तु है तथा वेदांत के अनुसार जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।

Monday, November 4, 2019

संत की सीख


संत श्री रामचंद्र डोंगरे जी महाराज के पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आते थे। वह लोगों की कठिन से कठिन समस्याओं को पल भर में सुलझा देते थे। एक बार उनका एक भक्त रोते हुए उनके पास पहुंचा और उनसे हाथ जोड़कर बोला, ’महाराज, मेरे परिवार में पर्याप्त सुख है, अपार धन-संपत्ति है, संतान भी है पर मेरे केवल दो पुत्रियां हैं कोई पुत्र नहीं है। बिना पुत्र के मुझे अपना जीवन अधूरा दिखाई देता है।’
डोंगरे जी महाराज बोले, ’तुम पुत्र प्राप्ति के लिए इतना उत्सुक क्यों हो?’ इस पर वह व्यक्ति बोला, ’महाराज, पुत्र के बिना मुझे मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी?’ उस भक्त का जवाब सुनकर डोंगरे जी महाराज बोले, ’तुमने किसी ऐसे पिता को देखा है जिसकी पुत्रियां हों और उसे मोक्ष की प्राप्ति न हुई हो?’ भक्त बोला, ’महाराज, मैंने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा तो नहीं है लेकिन हां, इस तरह की बातें सुनी जरूर हैं।’ इस पर डोंगरे जी महाराज बोले, ’जिस सचाई को तुमने स्वयं नहीं देखा, उसे मानते क्यों हो? जीवन में सुनी-सुनाई बातों पर विश्‍वास करने वाले अपने जीवन को सही ढंग से नहीं जी सकते। मैं तो अनेक ऐसे परिवारों को जानता हूं जो कई-कई पुत्रों के होते हुए भी संतुष्ट नहीं हैं। यदि पुत्र होने मात्र से पूर्णता होती तो कुसंस्कारी बेटों से माता-पिता परेशान क्यों होते? पुत्र या पुत्री होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अपनी दोनों पुत्रियों को ही अपना उत्तराधिकारी मानो। उन्हें अच्छे संस्कार, अच्छी शिक्षा दिलाओ। यदि तुम अपनी दोनों पुत्रियों का पालन-पोषण बिना किसी भेदभाव के पूर्ण संतुष्ट होकर करोगे तो शायद एक दिन तुम्हारी बेटियां अपनी प्रतिभा से आसमान छू लेंगी और उनकी उंचाई को छूना शायद अनेक पुत्रों के द्वारा भी संभव न हो। इसके लिए तुम्हें अपने मन से पुत्र-पुत्री में भेदभाव की धारणा को इसी समय उखाड़ फेंकना होगा।’ उस भक्त ने उसी क्षण संकल्प किया कि वह पुत्र-पुत्री में भेदभाव नहीं करेगा।

Sunday, November 3, 2019

उपदेश का मर्म


यह उस समय की बात है जब कौरव व पांडव गुरु द्रोण के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। एक दिन गुरु द्रोण ने अपने सभी शिष्यों को एक सबक दिया- सत्यम वद अर्थात सत्य बोलो। उन्होंने सभी शिष्यों से कहा कि इस पाठ को भली-भांति याद कर लें, क्योंकि उनसे यह पाठ कल पूछा जाएगा। 

अध्यापन काल समाप्त होने के उपरांत सभी अपने-अपने कक्षों में जाकर पाठ याद करने लगे। अगले दिन पुन: जब सभी शिष्य एकत्रित हुए तो गुरु द्रोण ने सबको बारी-बारी से खड़ा कर पाठ सुनाने के लिए कहा। सभी ने गुरु द्रोण के समक्ष एक दिन पहले दिया गया सबक दोहरा दिया, किंतु युधिष्ठिर चुप रहे। गुरु के पूछने पर उन्होंने कहा कि वे इस पाठ को याद नहीं कर पाए हैं।

इस प्रकार 15 दिन बीत गए, किंतु युधिष्ठिर को पाठ याद नहीं हुआ। 16 वें दिन उन्होंने गुरु द्रोण से कहा कि उन्हें पाठ याद हो गया है और वे इसे सुनाना चाहते हैं। द्रोण की आज्ञा पाकर उन्होंने सत्यम वद बोलकर सुना दिया। गुरु ने कहा - युधिष्ठिर, पाठ तो केवल दो शब्दों का था। इसे याद करने में तुम्हें इतने दिन क्यों लगे? 

युधिष्ठिर बोले, ‘गुरुदेव, इस पाठ के दो शब्दों को याद करके सुना देना कठिन नहीं था, किंतु जब तक मैं स्वयं आचरण में इसे धारण नहीं करता, तब तक कैसे कहता कि मुझे पाठ याद हो गया है?

सच ही है कि उपदेश का मर्म वही समझता है जो उसे धारण करना जानता है। वाणी के साथ आचरण का अंग बन जाने वाला ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है और इसे धारण करने वाला सच्चा ज्ञानी है।

Saturday, November 2, 2019

सबसे बड़ा धर्म


हीरे-जवाहरात के  एक बड़े व्यापारी थे - देवीदीन। व्यापार में वह किसी प्रकार की अनीति नहीं करते थे। वह दूसरे व्यापारियों के हितों का भी ध्यान रखते थे। एक बार उन्होंने किसी व्यापारी से जवाहरात खरीदने का सौदा किया। भाव तय हो गया और यह भी निर्धारित हो गया कि अमुक समय के भीतर वह व्यापारी देवीदीन को जवाहरात दे देगा। दस्तावेज पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर हो गए।संयोग से इस अवधि में जवाहरात का भाव बढ़ गया। इस भाव पर यदि वह माल देता तो उसे भारी हानि हो जाने की आशंका थी। बेचारा व्यापारी संकट में पड़ गया, पर उसे अपना वचन तो निभाना ही था। देवीदीन को मूल्य बढ़ जाने की बात मालूम हुई तो वह उस व्यापारी की दुकान पर गए। देवीदीन कुछ कहें, उससे पहले ही व्यापारी ने कहा, ’सेठ जी, विश्‍वास रखिए, मैं अपने वादे को हर हाल में पूरा कर दूंगा। आप चिंता न करें।’देवीदीन ने कहा,’ मैं जानता हूं कि आप अपने वादे को हर हालत में पूरा कर देंगे, लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि आप बेहद चिंतित हैं। देखिए, हमारी चिंता का मुख्य कारण वह दस्तावेज है, जिस पर हमारे हस्ताक्षर हैं। यदि दस्तावेज को नष्ट कर दिया जाए तो चिंता का अपने आप अंत हो जाएगा।’ व्यापारी ने कहा, ’नहीं, नहीं, सेठ जी ऐसा करने की जरूरत नहीं है, मुझे केवल दो दिन का समय दीजिए।’ 

देवीदीन ने दस्तावेज निकाला और उसे टुकड़े-टुकड़े कर फेंकते हुए बोले, ’यह करार हमारे हाथ-पैर बांधता था। इस सौदे में भाव बढ़ जाने से मेरे साठ-सत्तर हजार रुपए आपकी ओर निकलते। आपकी स्थिति मैं जानता हूं। आप कहां से देंगे इतनी बड़ी राशि?’आड़े समय में एक-दूसरे की सहायता करना मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।’

Saturday, October 26, 2019

ईमानदारी का इनाम


एक भिखारी को बाज़ार में चमड़े का एक बटुआ पड़ा मिला। उसने बटुए को खोलकर देखा। बटुए में सोने की सौ अशर्फियां थीं। तभी भिखारी ने एक सौदागर को चिल्लाते हुए सुना, ‘मेरा चमड़े का बटुआ खो गया है! जो कोई उसे खोजकर मुझे सौंप देगा, मैं उसे इनाम दूंगा!’ भिखारी बहुत ईमानदार आदमी था। उसने बटुआ सौदागर को सौंपकर कहा, ‘ये रहा आपका बटुआ! क्या आप इनाम देंगे?’ ‘इनाम!’  सौदागर ने अपने सिक्के गिनते हुए हिकारत से कहा, ‘इस बटुए में तो दो सौ अशर्फियां थीं! तुमने आधी रकम चुरा ली और अब इनाम मांगते हो! दफा हो जाओ वर्ना मैं सिपाहियों को बुला लूंगा!’इतनी ईमानदारी दिखाने के बाद भी व्यर्थ का दोषारोपण भिखारी से सहन नहीं हुआ। वह बोला, ‘मैंने कुछ नहीं चुराया है! मैं अदालत जाने के लिए तैयार हूं!’ अदालत में काजी ने इत्मीनान से दोनों की बात सुनी और कहा, ‘मुझे तुम दोनों पर यकीन है। मैं इन्साफ करूंगा। सौदागर, तुम कहते हो कि तुम्हारे बटुए में 200 अशर्फियां थीं, लेकिन भिखारी को मिले बटुए में सिर्फ सौ अशर्फियां ही हैं। इसका मतलब यह है कि यह बटुआ तुम्हारा नहीं है। चूंकि भिखारी को मिले बटुए का कोई दावेदार नहीं है इसलिए मैं आधी रकम शहर के खजाने में जमा करने और बाकी भिखारी को इनाम में देने का हुक्म देता हूं।’ बेईमान सौदागर हाथ मलता रह गया। अब वह चाहकर भी अपने बटुए को अपना नहीं कह सकता था क्योंकि ऐसा करने पर उसे कड़ी सजा हो जाती। इन्साफ-पसंद काजी की वज़ह से भिखारी को अपनी ईमानदारी का अच्छा इनाम मिल गया। 

Thursday, October 24, 2019

मन का राजा


राजा भोज वन में शिकार करने गए लेकिन घूमते हुए अपने सैनिकों से बिछुड़ गए और अकेले पड़ गए। वह एक वृक्ष
के नीचे बैठकर सुस्ताने लगे। तभी उनके  सामने से एक लकड़हारा सिर पर बोझा उठाए गुजरा। वह अपनी धुन में मस्त था। उसने राजा भोज को देखा पर प्रणाम करना तो दूर, तुरंत मुंह फेरकर जाने लगा।

भोज को उसके व्यवहार पर आश्‍चर्य हुआ। उन्होंने लकड़हारे को रोककर पूछा, ’तुम कौन हो?’ लकड़हारे ने कहा, ’मैं अपने मन का राजा हूं।’ भोज ने पूछा, ’अगर तुम राजा हो तो तुम्हारी आमदनी भी बहुत होगी। कितना कमाते हो?’ लकड़हारा बोला, ’मैं छह स्वर्ण मुद्राएं रोज कमाता हूं और आनंद से रहता हूं।’ भोज ने पूछा, ’तुम इन मुद्राओं को खर्च कैसे करते हो?’ लकड़हारे ने उत्तर दिया, ’मैं प्रतिदिन एक मुद्रा अपने ऋणदाता को देता हूं। वह हैं मेरे माता पिता। उन्होंने मुझे पाल पोस कर बड़ा किया, मेरे लिए हर कष्ट सहा। दूसरी मुद्रा मैं अपने ग्राहक असामी को देता हूं ,वह हैं मेरे बालक। मैं उन्हें यह ऋण इसलिए देता हूं ताकि मेरे बूढ़े हो जाने पर वह मुझे इसे लौटाएं।

तीसरी मुद्रा मैं अपने मंत्री को देता हूं। भला पत्नी से अच्छा मंत्री कौन हो सकता है, जो राजा को उचित सलाह देता है ,सुख दुख का साथी होता है। चौथी मुद्रा मैं खजाने में देता हूं। पांचवीं मुद्रा का उपयोग स्वयं के खाने पीने पर खर्च करता हूं क्योंकि मैं अथक परिश्रम करता हूं। छठी मुद्रा मैं अतिथि सत्कार के लिए सुरक्षित रखता हूं क्योंकि अतिथि कभी भी किसी भी समय आ सकता है। उसका सत्कार करना हमारा परम धर्म है।’ राजा भोज सोचने लगे, ’मेरे पास तो लाखों मुद्राएं हैं पर जीवन के आनंद से वंचित हूं।’ लकड़हारा जाने लगा तो बोला, ’राजन मैं पहचान गया था कि तुम राजा भोज हो पर मुझे तुमसे क्या सरोकार।’ भोज दंग रह गए। 

Wednesday, October 23, 2019

कर्मों का फल

एक बार राजा बिम्बिसार ने भगवान महावीर से कहा, ’भगवन, मेरे कर्मों का अवलोकन करके बताएं कि मेरा भविष्य क्या है?’ भगवान महावीर ने उनके कर्मों का अवलोकन करके बताया, ’राजन, आप के पास असीमित संपत्ति है, सत्ता है, राजपाट है, ताकत है लेकिन अपने कर्मों के कारण मृत्यु के बाद आप को नरक में जाना पड़ेगा।’ यह सुन कर राजा परेशान हो गए। उन्होंने कहा, ’भगवन, मैं तो सभी कल्याणकारी कार्य करता रहता हूं। धर्म, कर्म में पीछे नहीं रहता। फिर भी मुझे नरक में जाना पड़ेगा। क्या इसका कोई उपाय है जिससे मुझे नरक में न जाना पड़े? उसके लिए मैं राज्य का खजाना भी लुटा सकता हूं।’ भगवान महावीर समझ गए कि राजा के मन में अभी भी अहंकार भरा हुआ है। उन्होंने कहा, ’एक उपाय है। यदि आप कर सको तो नरक से बच सकते हो।’ राजा ने कहा, ’मैं सब कुछ करने को तैयार हूं।’ भगवान महावीर ने कहा, ’आप अपने राज्य के पुण्य नामक श्रावक के पास जाओ और उससे किसी तरह सामयिक फल प्राप्त कर लो। सामयिक फल ही आप को नरक से बचा सकता है।’ राजा श्रावक के पास गए और बोले, ’महात्मन, मुझे सामयिक फल चाहिए। उसकी चाहे जितनी कीमत देनी पड़े मैं देने को तैयार हूं।’ श्रावक ने कहा, ’सामयिक समता को कहते हैं। धन, संपत्ति के अहंकार से ग्रसित व्यक्ति को समता कैसे मिल सकती है। आप को सामयिक फल नहीं मिल सकता।’ राजा भगवान महावीर के पास लौट आए और बोले, ’प्रभु सामयिक फल तो मुझे नहीं मिला लेकिन श्रावक ने बता दिया कि सामयिक फल कैसे मिल सकता है। नरक में जाने का सबसे बड़ा कारण राजपाट और धन दौलत है। इसके रहते मेरे मन से अहंकार जाएगा नहीं और जब तक अहंकार का वास मन में रहेगा, मुझे सामयिक फल मिल नहीं सकता।’ उन्होंने भगवान महावीर से उसी समय दीक्षा ली और राजपाट छोड़ कर संन्यास धारण कर लिया। 

Tuesday, October 22, 2019

लोहे का टोप

नादिरशाह करनाल के मैदान में मुहम्मदशाह की सेना को परास्त करते हुए दिल्ली पहुँचे। वहॉं दोनों बादशाह एक ही सिंहासन पर बैठे। मुहम्मदशाह की हालत हारे हुए बादशाह की तरह थी, उसका सिर झुका हुआ था और भीतर मन कॉंप रहा था कि नादिरशाह अब पता नहीं क्या बर्ताव करने वाला है। जीत कर दिल्ली आने से पहले उसके किस्से दरबार में पहुँच चुके थे, जिनमें नादिरशाह की सनकें और अजीबो-गरीब करतूतें शामिल थीं। दरबार में दोनों बादशाह बैठे ही थे कि नादिरशाह ने मुहम्मदशाह से पीने के लिए पानी मॉंगा। उसकी इच्छा जताते ही वहॉं नगाड़ा बजने लगा, जैसे किसी उत्सव की शुरुआत होने जा रही है। दस-बारह सेवक उपस्थित हो गए। किसी के हाथ में रुमाल था तो किसी के हाथ में खासदान। दो-तीन सेवक चांदी के बड़े थाल को लेकर आगे बढ़े। उसमें मोती-माणिक जड़े हुए कटोरे में जल भरा रखा था। ऊपर से दो सेवक कपड़े से उस परात को ढंके हुए बराबर चल रहे थे। नादिर की समझ में यह नाटक न आया। वह घबरा गया। मॉंगा पानी था और यह क्या तमाशा होने जा रहा है? उसने पूछा यह सब क्या हो रहा है? मुहम्मदशाह ने उत्तर दिया, आपके लिए पानी लाया जा रहा है। नादिर ने ऐसा पानी पीने से इंकार कर दिया। उसने तुरंत अपने भिश्ती को आवाज लगाई। भिश्ती हाजिर हुआ, नादिर ने अपना लोहे का टोप उतारकर भिश्ती से पानी भरकर लाने के लिए कहा। भिश्ती जब पानी ले आया तो टोप से ही उसने पानी पिया और फिर गंभीर स्वर में कहा, ‘यदि हम भी तुम्हारी तरह पानी पीते तो ईरान से भारत न आ पाते। वीरता, विलासिता और वैभव से नहीं कठिन परिस्थितियों के अध्ययन से ही जन्मती और बढ़ती है।